भीमाल पेन जयंती स्पेशल
जानिये गोंडी धर्म में भीमाल पेन जयंती का सार -
👉कोसोडुम मुठवा मॊद
गोंडवाना के प्राचीन शक्ति(देवता) आर्थात "पेन"
कुवाराल भीमा जीवन गाथा
सभी रयोर-रया (युवक-युवती)जर्रुर पड़े
( विदर्भ माझा न्युज 24 ) :- येर गटटा कोर गुन्डुर/बय्यर लांजी इस जघह के गोंड राजा "सयमाल" ये वहां के राजा(गुन्डूर मुर्सेनाल्र)तथा इनकी रानी "झमिया" थे ये मडावी घराना येडवेंन सगा से थे इन दोनों के पुत्र "भूरा मडावि"थे इन्हें भूरा भगत भी कहा जाता है
पेंगुदा बेदुला जगह के ढोलापुयार उइका राजा की पुन्गार, मियाड (सुपुत्री) "कोतमा उइका" थी
भूरा मडावी(नांगा बयगा) (७देव)तथा कोतमा (नांगा बयगिन)उइका (६देव) ये दोनों की मडमींग(शादी) हो गई इंन दूनो के विस्तार अर्थात 12 छाव्वांग(बच्चे)
पहिला पुत्र
भीमाल मडावी/कुवरा भीमा/खिला मुठ्वाभीमा/वड़ी कुसार सय्वारी भीमा/भीमा लिंगो/कय्वारी भीमा/मुठ्वा पोय/सरेका मर्री/बीलअम्बाल/जल देवता/भीम पाड़ा/भूमिया पेन/तंद्री पोय/नार्सेन/मेंढा देव इत्यादि नामोसे पहचाना जाता है
भीमल की पारंगत कला:)कमठा/बंड्या/कायठु/मुष्टि/कुष्ठी/कसरत/जोग/तंद्री मोद/बय्गा मोद/इत्यादि
दूसरे भाई
जाटबा/ठाकुर देव (जाटवा) है ।
माना जाता है की ठाकुर देव बीज परीक्षण, भूमि उर्वरा परीक्षण, जल, कीट पतंगी गुण-धर्म के ज्ञाता थे,
जिन्होंने ग्राम के मानव समुदाय को फसल जीवनचक्र के ज्ञान के द्वारा अधिक अन्न-धन उपजाकर समृद्धि हासिल करने का मार्ग बताया ।
इसलिए ग्राम देवी देवताओं की मान्यता अनुसार बिदरी मनाकर बीज सूत्र/बोए जाने वाले अन्न बीज का अंश चढाकर बीज की रक्षा, फसलों की कीट-पतंगों से रक्षा, भूमि उर्वरा, हवा, जल सान्द्रता/समन्वय आदि प्रकृतिगत वैधानिक रक्षा की कामना पूर्ति के लिए कृषि ग्राम जीवन में ठाकुर देव की पूजा की जाती है ।
ठाकुर देव की स्थापना भी महुआ, आम, नीम आदि मान्य पेड़ों पर ही प्रकृतिगत सांस्कारिक विधानपूर्वक किया जाता है,
यह ग्राम का ठाकुर और ग्राम देवों मे प्रमुख है ।
तीसरे भाई हिरबा तथा चोंथे भाई केश्बा
ग्राम जीवन में गोंडवाना के जीवन निर्वाह के साथी पशु-पक्षी, गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुकरी-मुर्गी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
बैलों के माध्यम से कृषि कार्य किए जाते हैं तथा गाय, भैंस, भेड़, बकरी से दूध उत्पादन किया जाता है ।
इन पशुओं से परिपूर्ण परिवार समृद्ध परिवार कहलाता है,ये मानव सहयोगी पशु-पक्षी धन के प्रतीक माने जाते हैं ।
इन्हें चारागाह में ले जाने के पूर्व ग्राम के बीचों-बीच या किनारे निर्धारित एक सामूहिक गौठान में रखा जाता है ।
इसी सामूहिक गौठान के पास ही इन्ह की स्थापना की जाती है, जो पशु-पक्षियों की प्रकृति के जानकार, संरक्षक और वैधक कार्य से परिपूर्ण था.
इन्होंने आदिम मानव को पशुओं की प्रकृति, संरक्षण एवं व्यावहारिक जीवन में उनकी उपयोगिता का ज्ञान प्रदान कर जीवन में समृद्धि प्राप्त करने का संदेश दिया ।
इस आधार पर खीला मुठवा ग्राम पशुओं के संरक्षक, रोग-दोष से मुक्ति, जंगली जानवरों, कीट-पतंगों से सुरक्षा, कृषि कार्यों में उपयोग में लाई जाने वाली औजारों का निर्माण एवं सुरक्षा करने वाला देव माना जाता है ।
इसलिए इन्हें ग्राम के शमूहिक गौठान के पास ही स्थापित किया जाता है,इन्हें भी किसी विशाल वृक्ष-सेमल, महुआ, नीम आदि में (मान्यता अनुसार) स्थापित किया जाता है ।
पाचवे भाई बाना तथा छटवे भाई भाजी
गावँ की सरहद में रहकर १० दिशाओं में सुरक्षा कवच बनकर गावँ की रक्षा करने वाला देव इन्हें कहलाता है.
उपरोक्त ५ भाईयों में से प्रथम महाबली/शक्तिशाली, हवा, बिजली, बादल, पानी, तूफान, वर्षा, प्रकृति के जानकार, तंत्र-मंत्र, झाड़ा-फूँका, वैध्य कला में पारंगत, मढ़िया के रखवाला "भिमाल पेन" है ।
इन्हे "नार" अर्थात ग्राम की सरहद का रखवाला "नारसेन" देव भी कहा जाता है ।
इसे ग्राम की सरहद पर स्थित पेड़, चट्टान, पत्थर आदि में स्थापित किया जाता है,माना जाता है की नारसेन देव ग्राम की दशों दिशाओं की सरहद से ग्राम में प्रवेश करने वाले विपत्तियों को रोकने की क्षमता इन्ह में है ।
इसलिए वह अपने भाई-बहनों (ग्राम देवी देवताओं) तथा ग्रामजनों की सरहद में रहकर हर मुसीबत से रक्षा करने वाला देव माना जाता है ।
कुंआरा भिमाल सबसे बड़े पुत्र/भाई के रूप मे स्थापित हुए,इनके अलावा शेष भाई-बहन भी ग्रामसेवा, जनसेवा में ग्राम के अनेक खूट, पाट, ठानों, ताल, तरिया, पनघट, खेत-खानिहाल में मान्यता अनुसार विराजमान हैं, जो आगे शोध का विषय है।
क्षेत्रीय बोली-भाषा के आधार पर इन ग्राम देवी-देवताओं के नाम के उच्चारण में अपभ्रंस हो सकता ह
सातवे भाई
मोकाशा:)मोकाशा खॆति के तंत्र में पारंगत हुवे और वे खेती क तंत्र के गुरु(मुठ्वा) बने और उन्हॊने पुरे गोंडवाना को खेती का तंत्र सिखाया
मोकाशा पेन का कार्य आगे बदने वाले गोंडवाना के गन मोकाशी गन कहलाये
आजभी खेतोमे मोकाशा पेन की स्थापना की रहती है खेती के पहली फसल का मान उन्हेही चडता है
आठवी तथा नववी दाई
पंढरीदाई और पुंगार दाई
इन्हें "येर पोंग्सीहे(धान को पानी पोह्चानेवाली) दाई और "दाना पिन्ड्सीहे दाई"(धान फलानेवाली) इन दोनों दाई ने दान्य कोठारो का निर्माण किया गावमे सब अपने दान जमा करते थे और एक दुसरे को मदत करते थे
दस और ग्यारवी दाई
मुन्गुररदाई तथा कुषारदाई
इन्हें शिवा-रिल के नाम से भी जाना जाता है
प्रकृति की होने वाली मार (धुप ,बारिश,तूफ़ान) इत्यादियोसे बचाव के लिए पुनाराभास के शक्ति जगाने वाली दाई कह के इन्हें पूजा जाता है
बारावि दाई
सुबसे छोटी बहन
बेगल दाई/शीतला दाई/चुडूरर दाई/माता माय/वेद्द दाई/खेरा दाई/नारुंग बेगा/इत्यादि नामोसे इन्हें जाना जाता है
बेगा दाई (doctor) अर्थात वे वैद कला में पारंगत हुई और वे वैद गुरु (बेगा मुठ्वा)बनी उन्होंने इसप्रकार अपनी सेवा गोंडवाना को दी
बैग दाई के काम को आगे बडाने वाले गोंडवाना के गन उन्ही के नाम से जाने गए अर्थात "बैगा गोंड"
बैग दाई(शीतला दाई) का हर एक गाव के सीमा पे ठाना(मंदिर)रहता है
आओ जाने भिमालपेन की एक छोटी गाथा.
कुंवारा भिवसन याने नागपुर जिल्हे के पारशिवनी तालुके का महत्वपूर्ण स्थान है जहा संपूर्ण गोन्ड़वाना की श्रद्धा पूर्णभाव से जुडी है, हर साल चैत्र महीने मे यहा सव्वा महीने की जत्रा याने मेला रहने के कारण पूरे गोन्ड़वाना को यह स्थान परिचित है . . . कही वर्ष पूर्व आज के मध्य प्रदेश के बालाघाट जिल्हा मोहमभटटा राज्य के राजा सयमाल मडावी इनका राज था. . . . उनके रानी का नाम झमया था. . . उन्हे भुरा भगत नाम का पुत्र था. . ये पुत्र बड़ा ही साहसी था और अकेलेही जंगल मे जाकर खुंखार जानवरो का शिकार करना उनका शौक था. . .एक दिन भुरा भगत बैहर के जंगल मे शिकार करने गये जिसे हम आज काना किसली नाम से जानते है . . . उसी दिन उसी राज्य के राजा ढोला उइका अपनी पुत्री कोतमा के साथ उसी जंगल मे आये थे. . किंतु संजोग से भुरा भगत और कोतमा प्यास बुझाने हेतु पानी की खोज मे एक तालाब के किनारे मिले . . . एक दूसरे को देखकर दोनो मुग्ध हुए . . .और बाद मे इधर उधर की बाते करने लगे . . . संजोग से कोतमा के पिता ढोला उइका वहा पहुचे. . .और उन्होने भुरा भगत को देखा . . . भुरा की सुंदरता देखकर धोला के मन मे अपनी लड़की की शादि की कल्पना जागी . . .उन्होने अपनी लड़की के पास भुरा से शादि की बात रखि . . .विवाह की बाते हुई . . .शादि हुई . . . कोतमा गर्भार रहि . . .पेट मे बच्चा पल रहा था. . . एक दिन सास झमया को बोलि मुझे जंगल मे जाके कुछ खाने का मन हो रहा है . . .उसी दिन याने चैत्र महीने के पोर्निमा को कोतमा की पेट से एक बच्चे ने जन्म लिया . . . उसका नाम भीमा रखा गया . . .भुरा भगत और कोतमा को पुत्र होने की खुशिया पूरे राज्य मे मनायी गयी. . . .
भीमा को पाछवे सालही शिक्षा हेतु गोटूलमे डाला गया . . . गोटुल के अध्यक्ष याने मुर्सेनाल उस वक्त माहारू उइका थे. . . .वे भीमा के गुरू बने. . .भीमा के बाद भुरा भगत और कोतमा को कुल 11 पुत्र पुत्रिया हुई जिसमे 6 भाइ और 5 बहनो का समावेश था. . . .भीमा के साथ जाटबा, केशबा, हिरबा, भाजी, मुकोशा इन भाइयो और पन्ढरी, पुन्गार, मुगुर, कुशार, और खेरदाई इन बहनो का समावेश था. . . भीमा अलौकिक शक्ति पुरुष थे. . . लाठी, मुश्ती, धर्मकारण, राजकारण, समाजकारण, मल्ल, धनुर्विद्या, योग, जन्दरी, तन्दरी इत्यादि कला मे पारन्गत थे. . . भुरा भगत के बहन और बहनोई जो बेन्दुला राजा लोहडीगुडा सेवता उइका इन्हे दो जुड़वा पुत्रिया थी. . . जिनका नाम बम्ब्लाई और तिलकाई था. . . सर्व विद्या मे भीमा पारन्गत होने के कारण उन्हे गोन्डी मुठवा का दर्जा प्राप्त हुवा था. . .इतिहासकारो के अनुसार भीमा चौथे गोन्डी धर्मगुरू थे. . . जब भीमा के शादि का वक्त आया तो भीमा की बुवा रानी मानको और राजा सेवता उइका इन्होने अपनी बडी बेटि की शादि भीमा के साथ लगाने का मानस भुरा भगत और दाई कोतमा के पास बया किया . . . किंतु भीमा समाजसेवा मे रस रखते थे, उन्होने ना कर दीये . . .फ़िर भीमा को कैसे भी मनाने की सेवता और मानको ने सोची. . . भीमा हा कह दिया किंतु कुछ शर्ते रहेगी ऐसा कहा . . . सेवता और मानको ने यह बात बम्ब्लाई को बताई. . . वह खुश हुई . . .भीमा जब बम्ब्लाई को मिलने बेन्दुला पहुचे तो दोनो बहने बम्ब्लाई और तिलकाई उसे देखकर फिदा हो गई. . . दोनो ने शादि का प्रस्ताव रखा . . .और भीमा ने अपनी शर्त रखी. . . .
शर्त रखते वक्त भिमाने बम्ब्लाई और तिलकाई से कहा की दिन के चार पहर होते है . . पहला पहर सुबह जो परसापेन के लिए होता है, दूसरा पहर गुरू के लिए, तीसरा शाम माता पिता के लिए और चौथा पहर होता है अपनी पत्नि के लिए . . . .अगर आप मेरी पत्निया बनने इच्छुक है तो मेरे यहा से जाने के बाद और पत्नि का पहर खत्म होने से पहले याने सुबाह मुर्गा बाग देने से पहले आप एक दिन, एक माह या एक साल मे अगर मेरी शर्त के मुताबिक आप लोगोने मुझे धुन्ड़ लिया तो मै आपका बन जाऊँगा अन्यथा आप भी कुवारी और मै भी कुवारा . . .यह शर्त दोनो बहनो ने मान ली और विश्रान्ती के लिए चली गई. . . . भीमा सबको सोते देख राजवाडे से निकल पडे. . . सबसे पहले डोन्गरगड़ पहुचे जहा पहाडी के नीचे फड़ापेन का थाना है . . . वाहासे फ़िर अपने गुरू मुठवा महारू उइका के दर्शन हेतु निकल पडे. . . बिच रास्ते मे जो भी गाव दिखाई पडे वहा गोन्डी धर्म और संस्कृती की शिक्षा देते गये. . . .उधर दोनो बहने भीमा को खोजने अपने माता पिता को बताकर निकल पडी. . .
भीमा की खोज मे दोनो बहने डोन्गरगड़ फडापेन थाना पहुची तो पता चला की भीमा गुरुदर्शन के लिए निकल पडे . . .बम्ब्लाई थक गई तो उसने अपनी बहन तिलकाई को भीमा की खोज मे आगे भेज दिया . . .और बम्ब्लाई वही रुकि . . .जहा बम्ब्लाई रुकि थी वह ठिकाना आज भी डोन्गरगड़ की बम्ब्लाई नाम से पूरे देश मे प्रख्यात है . . .तिलकाई महारू भुमका की गोटुल की ओर निकल पडी. . . भीमा तबतक नागपुर राज्य मे पहुचे थे. . . भीमा समज चुके थे की तिलकाई उनका पीछा कर रहि है . . .उन्होने अपना मार्ग बदला और एक पहाडि पर ध्यानस्त हुए . . . तिलकाई आगे निकल गई. . .उधर भीमा बहोत दिन से घर ना आने के कारण पुरा परिवार उनकी खोज मे निकल पड़ा. . . किंतु पुरा व्यर्थ . . . वह समज चुके थे की भीमा ने अपना सारा जीवन समाज के लिए समर्पित किया है . . और यही कार्य हमे भी करना है . . .भीमा के परिवार ने अपना जीवन समाज को समर्पित कर दिया . . .उस वक्त पूरे परिवार ने अपने अपने क्षेत्र मे योगदान दिया . . जाटबा और हिरबा जलतद्न्य थे उन्होने सिचाई मे योगदान दिया . . .किशो और बाना क्रुशितद्न्य थे, भाजी और मुकोशा वास्तूतद्न्य थे उन्होने रास्ते बनाये, पन्ढरी और पुन्गार ने समाजकार्य किया और जन्गो रायताड़ की कल्पना को साकार किया . . . मुन्गुर तथा कुशार ने नगर रचना एवं ग्राम बसाये, खेरदाई शितलामाता तथा बैगामाता के नाम से भी जानी जाति है उसने वैद्यकशास्त्र प्रगल्भ किया . . . राजा भुरा और कोतमा भी लिन्गो की मार्गदर्शन से समाजसेवा मे जुट गये. . . . इधर भीमा नान्दपुर के एक पाहाडीपर ध्यानस्त हुए . . .नान्दपुड़ के राजा उइका गोत्र के थे. . ,बेदालझरी, चिखलखारी, नागलवारी, नान्दापार, कोलितसार, मरकाबार, वजरकुन्ड़, बोरबेड़, नवेनार परिसड़ नान्दपुर राज्य मे समाविश्ट था. . . एक दिन राजा उइका के राजवाडे मे चोरी हुई . . .राजाने शिपाईयो को फर्मान छोडा की चोर को धुन्डो. . . शिपाई थक जाते और रोज राजा की डान्ट पड़ती थी. . . एक दिन शिपाईयोने शक्कल लढाइ और ध्यानस्त भीमा कोही राजा के सामने पेश किया . . . पुछताछ हुई किंतु भीमा कुछ नही बोले. . . तंग आकर राजा ने भीमा को जेल मे डाला . . .जेल मे डालने के बाद भी भीमा लोगो को बाहर दिखते थे. . .ऐसा कहि बार हुवा. . . .अखिर राजाने अपनी हाथो भीमा को जेल मे डाला . . . फिर वही बात. . .भीमा फ़िर बाहर . . .राजा ने प्रणाम किया क्यो की राजा समज चुके थे ये कोई साधारण व्यक्ति नही महापुरुष है . . . .उइका राजा की इकलौती लड़की कजलादाई जो काफ़ी दिनो से अपने पिता के घर आयी हुई थीऔर पुत्र प्राप्ति ना होने के कारण काफ़ी चिंतित थी. . . .कजला की शादि कुरन्ग मसराम नामक राजासे हुई थी. . . कजला ने भीमा से प्रणाम कर पुत्र प्राप्ति का आसदान माँगा . . .आशीर्वाद देने के बाद भीमा अपने पूर्व स्थान पर ध्यानस्त होने निकल पडे. . . . कुछ दिन बाद कजला गर्भवती हुई . . .उसे विश्वास हुवा की भीमा के आसदानसेही मुझे खुशिया प्राप्त हुई . . .वह भीमा के दर्शन हेतु रोज गड़पर जाति रहि . . . उसके पिता राजा उइका को चिंता होती थी की राजकन्या इस अवस्था मे जाती है तो उसे बहुत तकलीफ़ होती होंगी . . .राजा उइका ने कजला के लिए वही पहाडी के नीचे भव्य विश्रामग्रुह बनाया . . . ये कजला महल आज भी जिर्ण अवस्था मे पानी मे डुबा हुवा उपस्थित है . . .जिसे आज रानी महल कहा जाता है . . . दिन बितते गये. . . रानी के प्रसुती के दिन नजदिक आते गये. . .रानी गड़पर नही चढ पाती थी. . . उसने भीमा से कहा "हे भिमालपेन अब मुझसे गढ नही चढा जायेगा मुझे दर्शन देने आप स्वयं नीचे आये" भीमा ने बिनती मान्य की . . . किंतु दो शर्ते रखी. . .एक . . .रानी जिस रास्ते से गढपर आयी थी, जाते वक्त उस रास्ते से वापिस ना जाये और दूसरी जबतक मै याने भीमा ना कहू पीछे मूडकर ना देखे. . .
भीमा का कहा मानकर रानी दूसरे रास्ते से निकल पडी. . . और नीचे आयी . . .
पीछे मुड़कर देखा तो भीमा का विक्राल रुप उसने देखा . . .
रानी मुर्छीत पडी और उसी अवस्था मे उसने एक बच्चे को जन्म दिया . . .
भीमा तीन पगो मे ही पहाडी के नीचे आये. . .उसमे से एक पग का निशान आज भी मौजूद है . .
लोग वह जल पवित्र मानकर पीते है . . .
जिस जगह भीमा ध्यानस्त बैठते थे वहा हरसाल पहले मेला भरता था. . .
इ.स.1600 मे उस परिसर की एक गोन्ड़ महिला बच्चा ना होने के कारण चिंतित थी. . .
उसने भिमालपेन को मन्नत माँगी . . .
और पेनकडापर छत बाँधने का वादा किया . . .
उसकी मनोकामना पूर्ण होने के बाद उसने पेनकडा पर छत बाँधा जो आज भी मौजूद है . . .
दिन ब दिन भीमा की कीर्ति होने के कारण सारा गोन्ड़ समुदाय वहा जाता गया . . .
लोग मन्नत माँगते गये. . .
भाव देने का वादा करते गये. . .
और भाव देने का रिवाज मजबुत होता गया . . .
आज लाखो लोग वहा हरसाल जाते है ...
नाटेनाल गोंडवाना सोडुम
सुर्रपोय - कार्तिकेसिंह घोडाम






