! ! लहू का बलिदान ! !
ना भूख थी ना प्यास थी ना दिन था ना रात थी।
हर पल ग़म और आंसुओं का मातम था।
कहीं हत्या तो कहीं अत्याचार का आलम था।
चारों ओर लहू और लाशों का ढेर था।
मदद के लिए चिख और पुकार का ही शोर था।
खौल उठता था होंगा उनका सबका लहू।
कैसे कर पाते थे होंगे वे अपने आपको काबू।
जब ये सितम सामने उनके आता था नज़र।
अपने आंखों के सामने देखकर ये सब मंज़र।
जिन्हें हम पुजते है वो है पर्मात्मा।
शायद उन्होंने ही भेजी हो अपनी आत्मा....
तभी वे कहलाने लगे हैं महात्मा।
तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा ये था नारा।
जैसे डूबते हुए को मिला हो तिनके का सहारा।
करो या मरो का था नारा।
जैसे आज़ादी के लिए संघर्ष का किया हो इशारा।
कितना संघर्ष किया कितना दिया लहु का बलिदान।
तब जाकर हासिल हुआ हमें आज़ादी का वरदान।
आज़ादी पाकर खिल उठे थे सभी के रूह-ए-दिल।
आखिर काबू में कर ली सर-ए-मंज़िल।
थी इक सोच उम्मीद-ए-सहर की।
आखिर सूरज ने दस्तक दे दी इक नये सवेर की।
भारत की बोली और रंग रूप है जुदा जुदा।
जैसे चमन में गुलों का रंग रूप-ए-महक हैं जुदा जुदा।
"बाबू" भाई सर्व धर्म सम भाव है।
इसलिए मेरा भारत सबसे महान है।

