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कोयतुर साल का अंतिम दिन शिमगा, होरी (शिवमगावरा)

 कोयतुर साल का अंतिम दिन शिमगा, होरी (शिवमगावरा)


आज से पुनाल सावरी(नया साल)शुरू होगा (कोयतुरों का पांडुम(त्यौहार)


 शिमगा सग्गुम कोया पुनेमी पाबुन की आप सभी  सगा पाड़ियों को विदर्भ माझा न्युज 24 की और से गढ़ा गढ़ा बधाई और जोहार ..जय सेवा...



पलास के फूल इस मौसम का अकेला फूल होता है जो अंतिम पुन्नी में मधु रस भरता है.



(विदर्भ माझा न्युज 24 - मुख्य संपादक) :- कल (बिता हुआ कल) के दिन जो होरी(होली) जलती है गांव के सभी पेनो को अर्जी विनती कर जलती है तथा गांव के प्रत्येक घर के पुरखा पेन के नाम से जलती है जो रात पूर्णिमा के अंतिम क्षणों में जलाया जाता है जिससे इस राख में अद्भुत शक्ति होती है, सभी प्रकार के शारीरिक रोग, किट व्याधियों से अनाज व फसलों को बचाने इसका उपयोग किया जाता है, इस होले के जलती हुई अंगारे  और कोयले को दूसरे दिन चूल्हा इस आशय से जलाया जाता है कि घर के चूल्हे सदैव जलते रहे... कालांतर में इसी होले के राख से बाबाओं और साधुओं ने प्रेरित होकर ठंडी, गर्मी व कीटाणु रोगाणु से बचने अपने शरीर पर लगाने की परम्परा शुरू की।

कोयतूर गोंड संस्कृति में इसलिए दूसरे दिन इसी राख और पलास के फूल से एक दूसरे को देकर अभिवादन किया जाता है, पलास के फूल इस मौसम का अकेला फूल होता है जो अंतिम पुन्नी में मधु रस भरता है.. तथा प्रकृति की शोभा बनाता है। रंग मन को रोमांचित करता है, अतः प्रकृति प्रदत्त रंग, राख हर्षोल्लास का पर्याय होता है। लोग बिना छल कपट के सभी बैर, ईर्ष्या, द्वेष भूलकर फिर से नए मौसम की तरह अपने आने वाले दिन की शुरुवात करते है।


नाचते, गाते है सभी से गले मिलकर आनंदित होते है... होले के मूल स्वरूप के साथ जीवन को रंगों और रसों से आनंदायी बनाये... आप सभी को होरी की गाड़ा गाड़ा बधाई, 



होली के परिपेक्ष्य में जो कथाएं हमने सुनी है हिरण्यकश्यप की बहन के इर्द गिर्द घूमती है.... जो अवतारवाद की कहानी है।

किंतु यदि कहानी के ऐतिहासिक विषय पर आते है तो कहानी के दूसरे पहलू सामने आते है कि हिरण्यकश्यप बहूत ही बलशाली राजा थे जिनका सामना करना किसी के बस की नही थी, वे महा योद्धा थे जिसे दोनों ही कहानी कहती है, पर मूलवासी मानते है, की राजा को कमजोर करने के लिए उनके संतान को नशा की जद में लाया गया गया जिसे उसकी बुआ बहुत ही स्नेह रखती थी, आज के दिन ही भतीजे के मोह में उसे तलाशने जाती है और  विरोधियों द्वारा उन्हें जलते हुए आग में धकेल दिया जाता है, जबकि प्रहलाद अवचेतन स्थिति में होता है।



                 जिसके लिए जिम्मेदारों के मुख में कालिख पोती जाती है उन्हें दंडित किया जाता है... 

दोनों ही स्थिति में हम होलीका को क्यों जलाएंगे, जो जल चुकी है, कोयतूर गोंड संस्कृती में हम अपने परिजनों को भी मिट्टी संस्कार से माटी देते है... इसलिये होले के कारण किसी भी प्रकार से हमारे मान्यताओं और मनाने के ढंग मेल नही करता...

मूलतः यह पर्व मौसम परिवर्तन, फसल उत्सव, पेन और सेवादारों की सेवा आदायगी का महत्वपूर्ण परब है। येसा कोयतूर गोंड संस्क्रीती मे माना जाता है..!

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